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शनिवार, 9 अप्रैल 2011

जमीन का फरिश्ता

मैं क्या करूं शिकायत जमीन से आसमान से
मेरों ने मुझ को नोचा खरोंचा जाने कहाँ कहाँ से

मैं शमशान में खड़ा रह रह के सोचता था
एक छोटा सा कफन अपने लिए लाऊं तो लाऊं मैं कहाँ से

मेरे लिए थी जिन्दगी मौत से भी बदतर
बहुत शातिर थे वो लुटेरे मुझे लूटा नगाड़े बजा बजा के

अचानक जन्तर मन्तर पर आया जमीन का इक फरिश्ता
मुझको गले लगाया मिलाया मुझकों मेरे हिन्दुस्तान से

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

धरम की झूठी ज्वाला में

धरम की झूठी ज्वाला में
न जाने कितने अहसास जले
घर बार जले खलिहान जले
इंसानियत के सारे फरमान जले


ये आग अभी तक बुझी नहीं
आग के मलबे के भीतर
सिसक सिसक कर
हर मजहब के भगवान जले


जल जल कर सब कुछ ख़ाक हुआ
जो बचे वो सौ सौ बार जले
धर्म के ठेकेदारों बोलो
किस मजहब का फरमान है ये
जो इन्सान जले और फिर
मेरे और तुम्हारे भी भगवान जले

-गुरु दयाल अग्रवाल ६.७.२०१०

रविवार, 9 मई 2010

एक बूँद

एक बूँद

बूँद बूँद सागर भर रहा है
परन्तु
अश्रु बहुत है व्यथित
किसी के सम्मुख गिरूँ , क्यों गिरूँ
और क्यों पलकों के भीतर सूख कर
जीवन भर यों ही घुट घुट के मरूँ

आज चल पवन ऐसी
सागर तक मुझे ले जाईयो
इस जगत में आया हूँ
कुछ देकर जाना चाहता हूँ
और कुछ नहीं है पास मेरे
केवल यही इक बूँद है सागर के लिए
- गुरु दयाल अग्रवाल -